Sunday, October 16, 2016

अंजाम-ए-जज़्बात

इंतज़ार  किया   उसका   हमने  , वक़्त   के  दरिया   बह   गए  

डूबने  के बजाये  उस दल दल  मैं ,कमल  बनके  हम  खिल  गए  

मजनू  बने , शायर  बने , आशिक  बनके  बर्बाद  हुए 

दुनियावालों  की  इस  बस्ती  मैं ,दुनियावाले  बन  के  रह  गए ...

अल्लाह ने कहा तुम तो दिलवाले हो ,सबके बस का ये खेल नहीं 

मेरी मर्ज़ी मैं अपनी मर्ज़ी मिला देना,सबकी हिम्मत ये होती नहीं 

नया हौंसला नयी उमंग नयी तरंग से मैं फिर उठा , दिल की बात हमेशा सुनु मैं,हमेशा रहेगी यही दुआ 

-आमीन

एक अंधे की नज़र

अँधा  मैं  हूँ  उस  दुनिया  के  लिए ,  जो  खुद  अंधी  है  अपने  गुरूर  मैं .
एक  अलग  दुनिया  है  मेरी  दोस्तों ,ख्वाबों की नदी के दुसरे छोर पे

हर  आवाज़  की  गहराई  सुन  के ,हाले  दिल  जान  लेता  हूँ  मैं .
अपने  दिल  के  दरवाज़े  पे  दस्तक  देके  औरों  के  लिए  दुआएं  बटोरे  लाता  हूँ  मैं .

इस  दुनिया  पे  तरस  आता  हैं  मुझे , जो  मुझको  बेचारा   कहती  है
इंसानियत , नेकी  और  नैसर्गिकता  को  ठुकरा , भौतिकता  को   बढ़ावा  देती  है

ये दुनिया मिल भी जाये तो क्या है दोस्तों?ये तो खुद उम्मीद पे टिकी है
एक अंधभक्त की तरह सूरज के चरों ओर इसकी धुरी है