Friday, February 10, 2017

हंसी के परे

जीवन के अनिश्चित मोड़ों पे, एक चोट मन को मार गयी
वक़्त ने ऐसा बेबस किया ,की आशाएं तार तार हुईं
हवा ने रौद्र रूप लिया,विलक्षण संकट की काया थी ,
इश्वर कहीं मिल जाता मुझको,तो खैर नहीं थी उसकी माया की

यह अंत ही तो है, अंतःकरण से एक आवाज़ आयी
क्या यही अंत है? मेरे अहं ने पलटकर वार किया,उस पीड़ा का परिहार किया
हाँ यही अंत है,हार स्वीकार करो, उस वेदना का अंतिम संस्कार करो

इस उत्तर ने मुझको पछाड़ दिया ,मेरे बोझ को मन से उतार दिया

एक हंसी उद्वीप्त मेरे कंठ से हुई,
जीवन की मिथकता पर विजयी पाती हुई,विवशता की लहरों को काटती हुई
ये हंसी मुझको ले आयी सात समंदर पार आशाओं की नौका पर हो के सवार

हौंसले के पैरों पर खड़े ,अब मुझको जीना है इस हंसी के परे ||

7 comments:

Dipz said...

bahut badhiya.. jab teh kia hai ki hasi k pare jana hai ab rokne vala koun hai.... badhe chalo

Unknown said...

👌👌

Anonymous said...

thanks guys :)

scorpio said...

Very deep and touching. :-)

scorpio said...

Very deep and touching. :-)

Unknown said...

Bahut badhiya... keep going..be happy dude....

Arijit said...

Just love it !! Amazingly touching to the very core