तरस ना खाओ ऐ दुनिया मुझपे, हौंसला मेरा अभी बुलंद है,
नाव जो सागर की मौजों से टकराए , हिलता उसका परचम है,
कभी उठे कभी छपाक सी गिर जाए वो ,कश्ती मेरी चलती जाए वो, नई दिशएं नए छोरों को तलाशती , अपने आप को जान गई वो,अपने मालिक को पहचान गई वो।
नाव जो सागर की मौजों से टकराए , हिलता उसका परचम है,
कभी उठे कभी छपाक सी गिर जाए वो ,कश्ती मेरी चलती जाए वो, नई दिशएं नए छोरों को तलाशती , अपने आप को जान गई वो,अपने मालिक को पहचान गई वो।
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